आलू की खेती कैसे करें

  


आलू जिसे सब जानते है उसका एक परिचय-  

भारतीयों के लिए सब्जियों का राजा है आलू, ये पोषक होने के साथ ही पेट जल्दी भरने का काम भ करता है, इसी कारण से इसे सभी प्रकार के फास्ट फूड में भी प्यार मिलता है। आलू की किसी भी सब्जी के साथ वैर नहीं है इसे किसी भी सब्जी में डाल लो, स्वाद बढ़ेगा ही बढ़ेगा। यही तो कारण है की भारत में आलू की खपत बहुत है।

इसकी खेती रबी मौसम या शरदऋतु में की जाती है। इसको अकाल नाशक फसल भी कहते हैं क्यूंकी इसकी उपज क्षमता समय के अनुसार सभी फसलों से तुलना में अधिक है । यह पोषक तत्वों का भण्डार हैजो मनुष्य के शरीर का पोषण करता है। बढ़ती आबादी के कुपोषण एवं भुखमरी से बचाने में आलू सहायक है।

खेत का चयन

ऐसी भूमि जो जल जमाव एवं ऊसर से रहित हो तथा जहाँ सिंचाई की उपयुक्त सुविधा हो वह खेत आलू की खेती के लिए उचित है।

खेत की जुताई

ट्रैक्टर चालित मिट्टी पलटने वाले डिस्क प्लाउ से एक जुताई करने के बाद डिस्क हैरो 12 तबा से एक बार दो चास करने के बाद कल्टीवेटर/नौफारा से एक बार दो चास करने के बाद खेत आलू की रोपनी योग्य तैयार हो जाता है।

हर जुताई में दो दिनों का अंतर रखने से खर-पतवार कम होती है तथा मिट्टी पर अच्छा प्रभाव पड़ता है, ऐसा करने से खेत में नमी बनी रहेगी तथा खेत खरपतवार मुक्त होगा।

खर-पतवार मुक्ति हेतु जुताई से एक सप्ताह पूर्व राउंड-अप नामक तृणनाशी दवा जिसमें ग्लायफोसेट नामक रसायन 42% का प्रति लीटर पानी में 2.5 मिली लीटर दवा का घोल बनाकर छिड़काव करने से फसल लगने के बाद खरपतवार में कमी हो जाती है।

खाद एवं उर्वरक

आलू खाद खाने वाली फसल है और यह मिट्टी के ऊपरी सतह से भोजन प्राप्त करती है। इसलिए इसे प्रचुर मात्रा में उर्वरकों की आवश्यकता होती है।

इसमें सड़े गोबर की खाद 20,000 किलो तथा 500 किलो खली प्रति हेक्टेर की दर से डाला जाता है। ऐसा करने से मिट्टी की उर्वरा-शक्ति बनी रहती है तथा रासायनिक उर्वरक पौधों को सही समय पर मिलता रहता है।

रासायनिक उर्वरकों में 150 किलोग्राम नाइट्रोजन 330 किलोग्राम यूरिया के रूप में प्रति हेक्टेर की दर से डाला जाता है। यूरिया की आधी मात्रा रोपनी के समय तथा शेष 30 दिन बाद मिट्टी चढ़ाने के समय डाला जाता है। 90 किलोग्राम सल्फर तथा 100 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेर की दर से डाला जाता है। सल्फर के लिए डी.ए.पी. या सिंगल सुपर फास्फेट दोनों में से किसी एक ही खाद का प्रयोग करें। डी.ए.पी. की मात्रा 200 किलोग्राम प्रति हेक्टेर तथा सिंगल सुपर फास्फेट की मात्रा 560 किलोग्राम प्रति हें। पोटाश के लिए 170 किलोग्राम म्यूरिएट ऑफ़ पोटाश प्रति हें. की दर से व्यवहार करें।

सभी रसायनों को एक साथ मिलाकर जुलाई अंत के पहले खेत में छिंठ कर जुताई के बाद पाटा देकर मिट्टी में मिला दिया जाता है।

रोपनी के समय आलू की पंक्तियों में खाद डालना अधिक लाभकर है परन्तु ध्यान रहे उर्वरक एवं आलू के कंद में सीधा सम्पर्क न हो नहीं तो कंद सड़ सकता है। इसलिए व्हील हो या लहसूनिया हल से नाला बनाकर उसी में खाद डालें। खाद की नाली से 5सेंमी. की दूरी पर दूसरी नाली में आलू का कंद डालें।

रोपनी का समय

अक्टूबर के प्रथम सप्ताह से लेकर दिसम्बर के अंतिम सप्ताह तक आलू की रोपनी की जाती है। परन्तु अधिक उपज के लिए मुख्यकालीन रोप 5 नवम्बर से 20 नवम्बर तक पूरा कर लें।

प्रभेदों का चयन

कुफ्री ज्योतिकुफ्री बादशाह, राजेन्द्र आलू -3, कुफ्री पोखराज, कुफ्री आनन्द, कुफ्री सतलज  एवं कुफ्री बहार मध्य अगात के लिए प्रचलित किस्म हैं जो 90-105 दिनों में परिपक्व हो जाता है।

कुफ्री सिंदुरी, कुफ्री लालिमा आलू एवं राजेन्द्र आलू -1, के प्रचलित पिछात प्रभेद हैं जो 120-130 दिन तक परिपक्व हो जाते है।

बीज दर

प्रति कंद 10 ग्राम से 30 ग्राम तक वजन वाले आलू की रोपनी करने पर प्रति हैकटर 10 क्विंटल से लेकर 30 क्विंटल तक आलू के कंद की आवश्यकता होती है।

बीजोपचार

शीत-भंडार से आलू निकालने के बाद उसे तिरपाल या पक्की फर्श पर छायादार एवं हवादार जगह में फैलाकर कम से कम एक सप्ताह तक रखा जाता है। अनुपयुक्त कंदों को प्रतिदिन निकालते रहना चाहिए। जब आलू के कंद में अंकुरण निकलना प्रारंभ हो जाय तब रासायनिक बीजोपचार के बाद रोपना चाहिए।

रासायनिक बीजोपचार

किसी भी फफूंद या जैविक बीमारी से बचाव के लिए प्रति लीटर पानी में 5 ग्राम इमिशान-6 तथा 500 मिलीग्राम स्ट्रोप्टोसाइक्लिन एन्टीवायोटिक दवा का पाउडर मिलाकर घोल तैयार करें।

इस घोल में कंद को 15 मिनट तक डुबाकर रखने के बाद घोल से बीज कंद को निकाल कर तिरपाल या खली बोरा पर छायादार स्थान में फैला कर रखा दें ताकि कंद की नमी कम हो जाय।

घोल बहुत गंदा हो जाने पर या बहुत कम हो जाने पर उस घोल को फेंक कर फिर से नया घोल तैयार कर लेना चाहिए।

फफूंदनाशक दवाओं में घोल तैयार करने के लिए इमिशान-6 सस्ता पड़ता है।

इसके अलावा इन्डोफिल एम.-45, कैप्टाफ/ ब्लाइटाक्स 2.5 ग्राम मात्र प्रति लीटर पानी में घोलकर घोल बनाया जा सकता है।

रासायनिक बीजोपचार आवश्यक है। ऐसा करने से खेत में आलू की सड़न रुक जाती है तथा कंद की अंकुरण क्षमता बढ़ जाती है।

रोपने की दूरी

आलू को शुद्ध फसल के लिए दो पंक्तियों के बीच की दूरी 40-60 सें.मी. तक रखें परन्तु ईख में आलू की अंतरवर्ती खेती करनी हो तो ईख की दो पंक्तियों के बीच की दूरी के आधार पर ईख को दो पंक्तियों के बीच में 40 सें.मी. से लेकर 50 सें.मी. की दूरी पर आलू की दो पंक्तियाँ रखें। प्रत्येक कतार में दो कंद के बीच की दूरी 15-20 सें.मी. तक रखें।

छोटे कंद को 15 सें.मी. की दूरी पर तथा बड़े कंद को 20 सें.मी. की दूरी पर रोपनी करें।

रोपनी की विधि

आलू रोपने के समय ही कुदाली से मिट्टी चढ़ाकर लगभग 15 सें.मी. ऊँचा मेड बना दिया जाता है तथा उसे कुदाली से हल्का थप-थप कर मिट्टी दबा दिया जाता है ताकि मिट्टी की नमी बनी रहे तथा सिंचाई में भी सुविधा हो।

सिंचाई

आलू में एक बार में थोड़ा पानी कम अंतराल पर देना अधिक लाभदायक है। क्यूंकी जब खाद की मात्रा ज्यादा रखी जाती है अतः रोपनी के 10 दिन बाद ही प्रथम सिंचाई अवश्य करनी चाहिए। ऐसा करने से अकुरण शीघ्र होगा तथा प्रति पौधा कंद की संख्या बढ़ जाती है और उपज में दो गुणी वृद्धि हो जाती है।

दो सिंचाई के बीच बीस दिन से अधिक अंतर न रखें।

खुदाई के 10 दिन पूर्व सिंचाई बंद कर दें जिस से कंद स्वच्छ निकलेंगे।

प्रत्येक सिंचाई में आधी नाली तक ही पानी दें।

ध्यान देने योग्य बाते

पूरी फसल अवधि में दो बार निकाई-गुड़ाई की आवश्यकता होती है।

रोपनी के 30 दिन बाद दो पंक्तियों के बीच में यूरिया का शेष आधी मात्रा यानि 165 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से डालकर कुदाली से मिट्टी बनाकर प्रत्येक पंक्ति में मिट्टी चढ़ा दिया जाता है तथा कुदाली से हल्का थप-थपाकर दबा दिया जाता है ताकि मिट्टी में पकड़ बनी रहें।

 

 

आलू रोपनी के 60 दिन बाद प्रत्येक पंक्ति में घूमकर फसल को देखा करें। यदि आलू का कंद दिखलाई पड़े तो उसे मिट्टी से ढँक दें नहीं तो उसका रंग हरा जो जायगा।

चूहा आक्रमण पर प्रत्येक बिल में 10 ग्राम थीमेट नामक कीटनाशी दवा डालकर छेद को बंद कर दें। ऐसा करने से चूहा बिल में ही मर जायगा या नहीं तो खेत छोड़कर भाग जायगा, या आप आलू के पौधों के बीच बीच में सिट्रोनेला नामक पौधे की घास उगा सकते हैं जिस की गंध चूहों को अच्छी नहीं लगती तथा वे खेत में नहीं आएंगें।

यदि आलू को बीज के लिए या अधिक दिनों तक रखना हो तो परिपक्वता अवधि पूरी होने पर लत्तर काट दें।

लत्तर काटने के 10 दिन बाद खुदाई करें। ऐसा करने से कंद का छिलका मुटाता है। जिससे आलू की भंडारण क्षमता बढ़ती है तथा सडन में कमी आती है।

 

आलू के पौधे का संरक्षण कैसे करें

भूमिगत कीटों से सुरक्षा हेतु रोपनी के समय ही फोरेट-10 जी जिसमें क्लोरोपायरिफास नामक कीट नाशी दवा रहता है उसका 10 किलोग्राम/ हेक्टर की दर से उर्वरकों के साथ ही मिलाकर डाल दिया जाता है जिस से धड़ छेदक कीटों से जी मिट्टी में ही दबे रहते हैं उसे सुरक्षा मिल जाती है।

 

पिछात झुलसा रोग से बचाव के लिए 20 दिसम्बर से 20 जनवरी तक 10-15 दिन के अंतराल पर फफूंदनाशक दवा का छिड़काव करें।

प्रथम छिड़काव में इन्ड़ोफिल एम-45, दूसरे छिड़काव में ब्लाइटॉक्स एवं तीसरे छिड़काव में इन्ड़ोफिल एम-45, दूसरे छिड़काव में ब्लाइटॉक्स एवं तीसरे छिड़काव में आवश्यकतानुसार रीडोमील फफूंदनाशक दवा का 2.5 ग्राम/लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।

प्रति हेक्टेयर 2.5 किलोग्राम दवा एवं 1000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। लगभग 60 टिन पानी प्रति हें. लग जाता है।

मध्य जनवरी के आस-पास लाही गिरने का समय हो जाता है। यदि लाही का प्रकोप हो तो मेटासिस्टोक्स नामक कीटनाशी दवा का प्रति लीटर पानी में एक मिली. दवा डालकर स्प्रे किया जाता है। दवा नापने के लिए प्लास्टिक सिरिन्ज उपयोग में लाएं।

लाही नियंत्रण से आलू में कुकरी रोग यानि लीफ रोल नाम विषाणु रोग का खतरा कम हो जाता है।

खुदाई

बाजार भाव एवं आवश्यकता को देखते हुए रोपनी के 60 दिन बाद आलू का खुदाई की जाती है। यदि भंडारण के लिए आलू रखना हो तो कंद की परिपक्वता की जाँच के बाद ही खुदाई करें। परिपक्वता की जाँच के लिए कंद को हाथ में रखकर अंगूठा से दवाकर फिसलाया जाता है यदि ऐसा करने पर कंद का छिलका अगल नहीं होता है तो समझा जाता है कि कंद परिपक्व हो गया है। ऐसे कंद की खुदाई करने से भंडारण के कंद सड़ता नहीं है। खुदाई दिन के 12.00 बजे तक पूरा कर लेनी चाहिए। खुदे कंद को खुले धूप में न रखकर छायादार जगह में रखा जाता है। धूप में रखने पर भंडारण क्षमता घट जाती है। मध्य मार्च तक आलू के सभी प्रभेदों की खुदाई अवश्य पूरी कर लेनी चाहिए। खुरपी या पोटेटो डीगर से खुदाई की जाती है। खुरपी से खुदाई करने पर ध्यान रहे आलू कटने न पावें।

 

आलू के रोग एवं बचाव

 

ब्लैक स्कर्फ

पहचान व हानि- आलू के पौधों में ब्लैक स्कर्फ रोग का प्रभाव राइजोक्टोनिया सोलेनाई नामक फफूंद की वजह देखने को मिलता है। पौधों पर यह रोग किसी भी अवस्था में दिखाई दे सकता हैजो मौसम में अधिक तापमान और आर्द्रता के होने पर बढ़ता है। इस रोग के लगने पर पौधों पर काले उठे हुए धब्बे दिखाई देने लगते हैं। जो रोग बढऩे पर कंदों पर भी हो जाते हैं। जिसे कंद खाने योग्य नहीं रहते।

 

नियंत्रण

इस रोग की रोकथाम के लिए खेत की गहरी जुताई करें।

प्रमाणित और रोगरोधी किस्म के कंदों का चयन करें।

कंदों की रोपाई से पहले उन्हें कार्बेन्डाजिम की उचित मात्रा से उपचारित करें।

 

पिछेती झुलसा

पहचान व हानि – आलू का पिछेता झुलसा रोग बेहद विनाशकारी है। यह रोग उत्तर प्रदेश के मैदानी तथा पहाड़ी दोनों इलाकों में आलू की पत्तियोंशाखाओं व कंदों पर हमला करता है।

जब वातावरण में नमी या बादल व कोहरा होने के कारण प्रकाश काम हो जाता है और कई दिनों तक बरसात होती हैतब इस का प्रकोप पौधे की पत्तियों से शुरू होता है।

पत्तियों की निचली सतहों पर सफेद रंग के गोले बन जाते हैंजो बाद में भूरे व काले हो जाते हैं। पत्तियों के बीमार होने से आलू के कंदों का आकार छोटा हो जाता है और उत्पादन में कमी आ जाती है।

 

नियंत्रण

आलू की फसल में कवकनाशी जैसे मैंकोजेब (75 फीसदी) का 0.2 फीसदी या क्लोरोथलोनील 0.2 फीसदी या मेटालेक्सिल 0.25 फीसदी या प्रपोनेब 70 फीसदी या डाइथेन जेड 78, या डाइथेन एम 45 0.2 फीसदी या ब्लाईटॉक्स 0.25 फीसदी क्या डिफोलटान और केप्टान 0.2 फीसदी के 4 से 5 का 10 से 15 दिनों के अंतराल पर छिडक़ाव प्रति हेक्टेयर करें।

मेटालेक्सिल नामक फफूंदी नाशक की 10 ग्राम मात्रा को 10 लीटर पानी में घोल कर बीजों को आधे घंटे डुबा कर उपचारित करने के बाद छाया में सुखा बोआई करें।

 

अगेती झुलसा

यह आलू का एक सामान्य रोग हैजो आलू फसल को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाता है। इस रोग के लक्षण फसल बोने के 3-4 हफ्ते बाद पौधों की निचली पत्तियों पर छोटे-छोटेदूर-दूर बिखरे हुए कोणीय आकार के चकत्तों या धब्बों के रूप में दिखाई देते हैंजो बाद में कवक की गहरी हरीनली वृद्धि से ढक जाते हैं। ये धब्बे तेजी से बढ़ते हैं और ऊपरी पत्तियों पर भी बन जाते हैं। यह रोग आल्टनेरिया सोलेनाई नामक कवक द्वारा होता है।

प्रारंभ में बिन्दु के आकार के ये धब्बे तेजी से बढ़ते हैं और शीघ्र ही तिकोनेगोल या अंडाकार हो जाते हैं।

आकार में बढऩे के साथ साथ इन धब्बों का रंग भी बदल जाता है और बाद में ये भूरे व काले रंग के हो जाते हैं। रोग का असर आलू के कंदों पर भी पड़ता हैकंद आकार में छोटे रह जाते हैं।

 

नियंत्रण

आलू के कंदों को मेन्कोजेब 0.2 प्रतिशत से उपचारित कर बोयें।

आलू की खुदाई के बाद खेत में छूटे रोगी पौधों के कचरे को इकट्ठा कर के जला दें।

फसल में बीमारी का प्रकोप दिखाई देने पर यूरिया 1% व मैंकोजेब 0.2% का छिडक़ाव प्रति हेक्टेयर की दर से करें।

आलू का स्कैब

यह रोग राइजोक्टोनिया सोलेनाई नामक फफूँद द्वारा होता है। स्कैब रोग में फसल के पहले कोई लक्षण नहीं दिखाई देते हैं लेकिन रोग के प्रारंभिक चरण में हल्के भूरे से लेकर गहरे घाव तक खुरदरी परत दिखती है। बाद मेंगंभीर रूप से संक्रमण होने के बाद आलू पर खुरदरी काली और गहरे रंग की परत पड़ जाती है। यह रोग आलू के कन्दों पर लगता है और देश के सभी मैदानी क्षेत्रों में पाया जाता है।

 

नियंत्रण

रोगग्रस्त कन्द का उपयोग नया करें।

क्षारीय मिट्टी में नाइट्रेट खाद नहीं दें।

हर साल खेत में एक ही समस्या होती है तो हरी खाद का इस्तेमाल करें इससे अगले सीजन में रोग की तीव्रता कम होगी।

रोपण के समय 20 किलो बोरिक एसिड दें।

खेत में पोटाश वाली खाद का संतुलित मात्रा में प्रयोग।

पर्याप्त मात्रा में कम्पोस्ट डालकर ट्राइकोडर्मा (किग्रा/हे) का प्रयोग करें।

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